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समय” की उत्पत्ति !!! Concept Time by God Krishna

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समय” की उत्पत्ति !!! Concept Time by God Krishna short story of lord krishna

समय” की उत्पत्ति !!! Concept Time by God Krishna

“समय” की उत्पत्ति !!!

समय = 0 (शून्य) क्षण ~ प्राणी मात्र की सुषुप्ति !!!
कल्पित पदार्थों और उनसे संबंधित विचारों तक मन सीमित है। इसके पार मन नहीं जा सकता है। मन के दायरे में नए पदार्थ/वस्तु और उससे संबंधित विचार यानी जो पहले कल्पनातीत था, अभी-अभी कल्पित हुआ है, उसके अस्तित्व में आने के साथ ही उस पदार्थ/वस्तु को प्राप्त करने की कामना/इच्छा, लालसा, राग, द्वेष, ईर्ष्या, क्रोध, आदि की उत्पत्ति होती है। इसी के साथ, उस पदार्थ/वस्तु और उसके विचार के संदर्भ में समय/काल की उत्पत्ति होती है। अगर किसी पदार्थ, विचार, आदि का अस्तित्व ही न हो तो समय का भी उस पदार्थ, विचार, आदि के संदर्भ में अस्तित्व नहीं होगा। अर्थात्, कल्पित वस्तु, विचार, आदि समय की परिधि में होंगे जबकि कल्पनातीत वस्तु, विचार, आदि का समय के साथ कोई सम्बन्ध नहीं हो सकता है। मन के दायरे में उपलब्ध वस्तु, विचार, आदि पर ही समय प्रभावी है। यानी समय के प्रभाव का दायरा मन के दायरे के बराबर ही है। हम कह सकते हैं कि मन में उपलब्ध पदार्थ, विचार, आदि समय के आश्रय हैं।
३० वर्ष पहले, मोबाईल फोन हमारे लिए कल्पनातीत था। किंतु, आविष्कार के बाद मोबाईल फोन मन के दायरे में आ गया। साथ ही उसे प्राप्त करने की इच्छा, राग, लोभ, आदि की भी उत्पत्ति हुई। प्राप्त करने में असमर्थ व्यक्ति में ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, हीन भावना, आदि की उत्पत्ति हुई। मन के दायरे में मोबाईल फोन के आने के बाद ही मोबाईल फोन के संदर्भ में समय/काल की उत्पत्ति हुई।
यदि कोई वस्तु मेरे लिए कल्पनातीत है तो मेरे लिए उस वस्तु के संबंध में समय का अस्तित्व ही नहीं रहेगा। लेकिन, यदि वही वस्तु आपके लिए कल्पित है तो उस वस्तु के संबंध से आपके लिए समय प्रभावी रहेगा।
“समय की सहज उपस्थिति में केवल कल्पित तत्त्व, पदार्थ, वस्तु, विचार, आदि ही व्यक्त/इन्द्रियगोचर होते हैं”
जन्म से लेकर मृत्यु तक हमारी तीन ही अवस्थाएँ होती हैं। पहला जाग्रत दूसरा स्वप्न और तीसरी सुषुप्ति। जब एक अवस्था होती है, तो बाकी दो नहीं होते हैं। तीनों ही अवस्थाओं में समय का पैमाना अलग-अलग होता है। मात्र १० मिनटों के लौकिक समय के हिसाब से, हम स्वप्नावस्था में कितना-कुछ देख लेते हैं साथ ही न जाने कहाँ-कहाँ घूम लेते हैं – यह तो सभी का अनुभव है। अतः जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति में समय की गति में निश्चित ही अंतर है। जब हम स्वप्नावस्था में होते हैं तो हमारा कोई जाग्रत संसार भी है इसका कोई ज्ञान नहीं होता है। सुषुप्ति में तो जाग्रत और स्वप्न ही क्या किसी पदार्थ तक की न उपलब्धि और न ज्ञान ही होता है।

मन सतत् क्रियाशील है। किन्तु, उसी विषय की हमें स्मृति होती है जिसके साथ मन संलग्न हो। कभी-कभी मंदिर की घंटी बजती है, पर हम उसे सुन नहीं पाते हैं  क्योंकि हमारा मन कान से संलग्न नहीं होता है। जाग्रत, स्वप्न व सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं में हमें भावात्मक या अभावात्मक अनुभूति होती है। हम जो निद्रावस्था का स्मरण कर सकते हैं, उसी से यह प्रमाणित हो जाता है कि निद्रावस्था में भी मन संलग्न था।

इन्द्रियगोचर सभी पदार्थों का तीन आयाम (dimension) होता है। लम्बाई, चौड़ाई, और ऊँचाई। चौथा आयाम “समय” है। लेकिन, पदार्थ ऐसे भी हैं जो लम्बाई, चौड़ाई, और ऊँचाई की परिधि में प्रतीत नहीं होते हैं। जैसे वायु, आकाश, अग्नि, विचार, इत्यादि। लेकिन, ये सब कल्पित होने के कारण समय की परिधि में होते हैं।
अगर समय = 0 (शून्य) क्षण है,

तो कल्पित पदार्थ/वस्तु, विचार, जल, अग्नि, वायु, आकाश, आदि का अस्तित्व तो होगा लेकिन, अव्यक्त रूप में – यही हमारी सुषुप्ति है जहाँ मन तो संलग्न होता है, किन्तु हमारे लिए समय शून्य होता है। यदि जाग्रत अवस्था के समय के पैमाने पर ८ (आठ) घंटे की सुषुप्ति है तो सुषुप्ति अवस्था के समय के पैमाने पर शून्य क्षण की सुषुप्ति है।
लौकिक समय के अनुसार, स्थूल शरीर को ८ (आठ) घंटे का विश्राम मिला। लेकिन, मैं सुषुप्ति अवस्था में स्थूल शरीर के माध्यम से सक्रिय नहीं था। सूक्ष्म शरीर के माध्यम से ऐसी अवस्था में सक्रिय था जब काल गतिशील नहीं होता है वरन् रूक जाता है।

लम्बाई, चौड़ाई और ऊँचाई के साथ एक वस्तु विशेष, यथा स्थिति में है। यदि १० क्षणों के लिए आपकी नींद टूटती है तो उन १० क्षणों के लिए वह वस्तु व्यक्त/इन्द्रियगोचर होता है। फिर, नींद आते ही यानी समय की शून्यता आते ही लम्बाई, चौड़ाई और ऊँचाई के साथ यथा स्थित वस्तु व्यक्त नहीं होता है। सुषुप्ति अवस्था में पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश क्रमशः अपने गुणों गंध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द के साथ अव्यक्त हो जाते हैं। इसीलिये सोया हुआ व्यक्ति न सुनता है, न देखता है, न सूँघता है, न चखता है, न स्पर्श करता है, न बोलता है, न ग्रहण करता है, न आनंद भोगता है, न मलोत्सर्ग करता है और न कोई चेष्टा करता है।

“अतः समय की शून्यता के कारण लुप्त हुए जाग्रत संसार के साथ सुषुप्ति अवस्था में स्थित राजा, भिखारी, विश्व का सबसे धनी व्यक्ति, सबसे गरीब व्यक्ति, धर्म गुरु, किसी देश का प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, सर्वश्रेष्ठ अभिनेता, गायक, खिलाड़ी, प्रेमी-प्रेमिका, हाँथी, घोड़ा और अन्य पशु पक्षी सभी एक समान होते हैं”
जय श्री कृष्ण !!

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