मोहम्मद अली जिन्नाह | Muhammad Ali Jinnah Biography in Hindi

 

मोहम्मद अली जिन्नाह | Muhammad Ali Jinnah Biography in Hindi

 

Muhammad Ali Jinnah – मुहम्मद अली जिन्ना बीसवीं सदी के एक प्रमुख राजनीतिज्ञ थे जिन्हें पाकिस्तान के संस्थापक के रूप में जाना जाता है। वे मुस्लिम लीग के नेता थे जो आगे चलकर पाकिस्तान के पहले गवर्नर जनरल बने। पाकिस्तान में, Muhammad Ali Jinnah आधिकारिक रूप से क़ायदे-आज़म यानी महान नेता और बाबा-ए-क़ौम यानी राष्ट्र पिता के नाम से नवाजा जाता है।

Muhammad Ali Jinnah – मोहम्मद अली जिन्नाह

पूरा नाम  – मोहम्मद अली जिन्नाह Muhammad Ali Jinnah
जन्म      –  25 दिसम्बर 1876
जन्मस्थान – कराची, पाकिस्तान
पिता       –  पूंजा जिन्ना
माता       –  मीठीबाई जिन्ना

पूरा नाम मुहम्मद अली जिन्ना
जन्म 25 दिसंबर, 1876
जन्म भूमि कराची, ब्रिटिश भारत
मृत्यु 11 सितंबर 1948
मृत्यु स्थान कराची, पाकिस्तान
धर्म इस्लाम
शिक्षा वकालत
संबंधित लेख जिन्ना के चौदह सूत्र
पद पाकिस्तान के पहले गवर्नर-जनरल
कार्यकाल 14 अगस्त 1947 – 11 सितम्बर1948
अन्य जानकारी मुहम्मद अली जिन्ना ने मुस्लिम लीग का गठन किया और ‘क़ायदे आज़म’ (महान नेता) के रूप में विख्यात हुए।
मुहम्मद अली जिन्ना पर निबंध | Essay on Muhammad Ali Jinnah in Hindi
मुहम्मद अली जिन्ना पर निबंध | Essay on Muhammad Ali Jinnah in Hindi

मोहम्मद अली जिन्नाह | Muhammad Ali Jinnah Biography in Hindi

पुराने दस्तावेजों के अनुसार, जिन्ना का जन्म 20 अक्टूबर 1875 को हुआ था। सरोजिनी नायडू  द्वारा लिखी गई जिन्ना की जीवनी के अनुसार, Muhammad Ali Jinnah का जन्म 25 दिसम्बर 1876 को हुआ था, जिसे जिन्ना की आधिकारिक जन्म तिथि मान लिया गया है। आज उनके जन्म दिन पर पाकिस्तान में अवकाश रहता है।

भारतीय राजनीति में Muhammad Ali Jinnah का उदय 1916 में कांग्रेस के एक नेता के रूप में हुआ था, मुस्लिम लीग की स्थापना 1906 में हुई। तब जिन्ना ने हिन्दू-मुस्लिम एकता पर जोर देते हुए मुस्लिम लीग के साथ लखनऊ समझौता करवाया था। यह समझौता लीग और कांग्रेस के बीच हुआ था। भारतीय मुसलमानों के प्रति कांग्रेस के उदासीन रवैये को देखते हुए जिन्ना ने कांग्रेस छोड़ दी। मुस्लिमों को स्वतंत्र राष्ट्र चाहिये ये भूमिका उन्होंने लीग के व्यासपीठ से पहली बार रखी, उन्होंने देश में मुसलमानों के अधिकारों की रक्षा और स्वशासन के लिए चौदह सूत्रीय संवैधानिक सुधार का प्रस्ताव रखा।

लाहौर प्रस्ताव के तहत उन्होंने मुसलमानों के लिए एक अलग राष्ट्र का लक्ष्य निर्धारित किया। 1946 में ज्यादातर मुस्लिम सीटों पर मुस्लिम लीग की जीत हुई और मुहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान की आजादी के लिए त्वरित कार्रवाई का अभियान शुरू किया। कांग्रेस की कड़ी प्रतिक्रिया के कारण भारत में व्यापक पैमाने पर हिंसा हुई। मुस्लिम लीग और कांग्रेस पार्टी, गठबन्धन की सरकार बनाने में असफल रहे।

इस समय जिन का आदर बहोत होने के वजह से मुस्लिमों के एकमेव नेता ऐसी उनकी छवी हुयी। इस प्रभाव के वजह से कॉग्रेस और ब्रिटिशों को उनकी स्वतंत्र राष्ट्र की मांग माननी पड़ी। स्वतंत्र पाकिस्तान के वो पहले गव्हर्नर और घटना समिती के अध्यक्ष थे।

मुहम्मद अली जिन्ना पर निबंध | Essay on Muhammad Ali Jinnah in Hindi

1. प्रस्तावना:

बीसवीं शताब्दी में मुस्लिम विचारधारा के प्रबल प्रतिनिधि के रूप में Muhammad Ali Jinnah का नाम प्रमुख है । वे एक कट्टर मुसलमान थे । वे भारतवर्ष को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद करवाना चाहते थे ।

आजादी की इस लड़ाई में उन्होंने अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया । उनकी राजनीतिक विचारधारा भारत की आजादी के समय ऐसे परिवर्तित हुई, जिसके फलस्वरूप अंग्रेजों ने दो राष्ट्रों के सिद्धान्त को जन्म दिया । उनके विचार में हिन्दू तथा मुसलमान दो पृथक-पृथक राष्ट्र हैं ।

इस रूप में वे भारतीय मुसलमानों की सामाजिक एवं राजनीतिक पृथकता व स्वशासन को स्वीकार करते थे । ”पाकिस्तान लेकर रहेंगे” कहकर उन्होंने हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच की खाई को अपनी कूटनीतिक चाल से और अधिक बढ़ा दिया । वे पाकिस्तान के ”मसीहा” और ”कायदे आजम” के रूप में जाने जाते हैं ।

2. जीवन परिचय, विचार एवं कार्य:

Muhammad Ali Jinnah  का जन्म एक समृद्ध खोजा परिवार में 23 दिसम्बर सन् 1876 में करांची में हुआ था । उन्होंने बैरिस्टर की परीक्षा इंग्लैण्ड से उत्तीर्ण की । वहां से आकर वे बम्बई में वकालत करने लगे । सन् 1913 से 1918 तक वे हिन्दू-मुस्लिम एकता के समर्थक थे । सन् 1916 में उन्होंने कांग्रेस और मुस्लिम लीग में समझौता करवाया था । 1920 में कांग्रेस की सरकार के विरुद्ध असहयोग नीति के कारण वे कांग्रेस से अलग हो गये ।

1928 में उन्होंने साइमन कमीशन के विरोध में मोतीलाल नेहरू और लाला लाजपतराय का साथ दिया । 1928 के बाद जिन्ना ने राजनीतिक नीति में आश्चर्यजनक परिवर्तन करते हुए अपनी जाति का विश्वास प्राप्त करने के लिए साम्प्रदायिक नीति को अपनाया और इसका प्रयोग राजनीति में किया, जिसकी वजह से मुसलमान जाति उन्हें अपना देवता मानने लगी ।

उन्होंने 1929 में 14 शोर्तों वाला कार्यक्रम लीग के सामने प्रस्तुत किया । केन्द्रीय और प्रान्तीय व्यवस्थापिका में एक तिहाई प्रतिनिधित्व मुसलमानों के लिए मांगा और साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली पर जोर दिया । सन् 1935 के अधिनियम के कार्यान्वित होने के बाद प्रान्तों में उनका प्रभाव मुसलमानों पर बढ़ने लगा ।

1944 में उन्होंने मुस्लिम सम्प्रदाय को यह समझाया कि संयुक्त भारत में बहुमत के शासन का अर्थ-सदा के लिए मुसलमानों को गुलाम बनना होगा और इस्लाम संकट में पड़ जायेगा । अपने प्रारम्भिक राजनीतिक जीवन में वे राष्ट्रवादी तथा हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रतीक माने जाते थे । मुस्लिम लीग में प्रवेश के बाद कट्टर मुसलमानों के सम्पर्क में आकर हिन्दू-मुस्लिम एकता सम्बन्धी विचारों को त्याग दिया और साम्प्रदायिकता तथा कांग्रेस विरोधी विचारों को ग्रहण किया ।

Muhammad Ali Jinnah ने गांधीजी की नीतियों और सिद्धान्तों का भी विरोध किया । उन्होंने 1928 की नेहरू रिपोर्ट में कही गयी मुसलमानों को अधिक प्रतिनिधित्व की बात को भी नहीं माना । मुस्लिम लीग के प्रभाव में आकर उन्होंने ”द्विराष्ट्र” के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया । 1940 में मुस्लिम लीग के लाहौर अधिवेशन में इसे स्वीकृत भी करा लिया।

Muhammad Ali Jinnah ने भारत-पाकिस्तान विभाजन को प्राकृतिक आवश्यकता बताते हुए यह कहा- ”हम मानते हैं कि हिन्दू और मुसलमान दो बड़े राष्ट्र हैं । हम चाहे कोई भी परिभाषा या परीक्षा लागू करें, हम दस करोड़ मुसलमान एक राष्ट्र हैं । हमारी सभ्यता और सस्कृति अलग है । हमारी भाषा, साहित्य, कला, नाम, उपनाम, मूल्य, धारणाएं, कानूनी नियम, नैतिक कोड, कस्टम और कैलेण्डर, इतिहास, परम्परा, हमारी इच्छाएं तथा जीवन का अलग दृष्टिकोण है ।”

Muhammad Ali Jinnah ने दृढ़तापूर्वक यह कहा कि हिन्दू और मुसलमानों के मतभेदों को समाप्त करने का एकमात्र यथार्थवादी और व्यावहारिक तरीका देश का विभाजन ही है । इसमें वे भारत और पाकिस्तान को दो राष्ट्रों में बांटकर कोई समझौता करना ही नहीं चाहने थे ।

Muhammad Ali Jinnah ने अपनी इस जीत पर बने रहते हुए मित्रलीगी मुसलमानों के साथ मिलकर साम्प्रदायिक दंगे करवाये तथा डायरेक्ट एक्शन के नाम पर बंगाल की सोहरावर्दी सरकार का समर्थन करते हुए तीन दिनों तक हिन्दुओं का कत्लेआम करवाया ।

3. उपसंहार:

इस प्रकार स्पष्ट है कि अपने प्रारम्भिक राजनीतिक जीवन में वे भले ही राष्ट्रवादी, हिन्दू-मुस्लिम एकता तथा लोकतन्त्र के प्रबल समर्थक थे, किन्तु जातिगत स्वार्थ व पद लिप्सा के प्रभाव से ग्रसित होकर Muhammad Ali Jinnah कट्टर मुसलमान बन गये । वे दो राष्ट्रों के सिद्धान्त के जन्मदाता व ‘पाकिस्तान के मसीहा’ भले ही हों, किन्तु भारत की अखण्डता व हिन्दुओं के प्रबल शत्रु थे ।

मुहम्मद अली जिन्ना (अंग्रेज़ी: Muhammad Ali Jinnah, जन्म- 25 दिसंबर, 1876; मृत्यु- 11 सितंबर 1948) ब्रिटिश भारत के प्रमुख नेता और मुस्लिम लीग के अध्यक्ष भी थे। जिन्ना कराची के एक संपन्न व्यापारी के घर जन्मे थे और सबसे बड़े बेटे थे। मुहम्मद अली जिन्ना ने बाद में अपना नाम संक्षिप्त करके ‘जिन्ना’ रख लिया था। जिन्ना के पिता ने जिन्ना को लंदन में एक व्यापारी कंपनी में प्रशिक्षु के रूप में भर्ती करा दिया था। लंदन पहुँचने के थोड़े समय बाद ही मुहम्मद अली जिन्ना व्यापार छोड़कर क़ानून की पढ़ाई में लग गए थे।

राजनीति में प्रवेश

मुहम्मद अली जिन्ना अपनी क़ानून की पढ़ाई पूरी करके युवा बैरिस्टर के रूप में बम्बई (वर्तमान मुम्बई) में अपना भाग्य आजमाने की सोचने लगे। बाद के दिनों में बम्बई में उनकी बैरिस्टर अच्छी चलने लगी। बाद में वक़ील के रूप में जमने के बाद जिन्ना ने राजनीति में सक्रिय रुचि लेनी आरंभ कर दी। उन्होंने दादाभाई नौरोजीतथा गोपालकृष्ण गोखले जैसे कांग्रेस के नरमदलीय नेताओं के अनुयायी के रूप में भारतीय राजनीति में प्रवेश किया। यह एक विडंबना थी कि वह 1906 में हिन्दुओं का ही प्रभुत्व रखने वाली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के सदस्य बने। वे हिन्दू-मुस्लिम एकता के उत्साही समर्थक भी थे।

मोहम्मद अली जिन्ना के साथ महात्मा गाँधी

लखनऊ समझौता

1910 ई. में वे बम्बई के मुस्लिम निर्वाचन क्षेत्र से केन्द्रीय लेजिस्लेटिव कौंसिल के सदस्य चुने गए, 1913 ई. में मुस्लिम लीग में शामिल हुए और 1916 ई. में उसके अध्यक्ष हो गए। इसी हैसियत से उन्होंने संवैधानिक सुधारों की संयुक्त कांग्रेस लीग योजना पेश की। इस योजना के अंतर्गत कांग्रेस लीग समझौते से मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्रों तथा जिन प्रान्तों में वे अल्पसंख्यक थे, वहाँ पर उन्हें अनुपात से अधिक प्रतिनिधित्व देने की व्यवस्था की गई। इसी समझौते को ‘लखनऊ समझौता’ कहते हैं।

ग़लत फ़हमी

जिन्ना कहते थे कि दोनों समुदाय इकट्ठे हो जाएँ तो गोरों पर हिंदुस्तान से चले जाने के लिए अधिक दबाव डाला जा सकता है। जिन्ना भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के समर्थक थे, परन्तु गांधीजी के असहयोग आंदोलन का उन्होंने तीव्र विरोध किया और इसी प्रश्न पर कांग्रेस से वह अलग हो गए। इसके बाद से उनके ऊपर हिन्दू राज्य की स्थापना के भय का भूत सवार हो गया। उन्हें यह ग़लत फ़हमी हो गई कि हिन्दू बहुल हिंदुस्तान में मुसलमानों को उचित प्रतिनिधित्व कभी नहीं मिल सकेगा। सो वह एक नए राष्ट्र पाकिस्तान की स्थापना के घोर समर्थक और प्रचारक बन गए। उनका कहना था कि अंग्रेज़ लोग जब भी सत्ता का हस्तांतरण करें, उन्हें उसे हिन्दुओं के हाथ में न सौंपें, हालाँकि वह बहुमत में हैं। ऐसा करने से भारतीय मुसलमानों को हिन्दुओं की अधीनता में रहना पड़ेगा। जिन्ना अब भारतीयों की स्वतंत्रता के अधिकार के बजाए मुसलमानों के अधिकारों पर अधिक ज़ोर देने लगे। उन्हें अंग्रेज़ों का सामान्य कूटनीतिक समर्थन मिलता रहा और इसके फलस्वरूप वे अंत में भारतीय मुसलमानों के नेता के रूप में देश की राजनीति में उभड़े।

कश्मीर मुद्दा तथा मृत्यु

मुहम्मद अली जिन्ना ने लीग का पुनर्गठन किया और ‘क़ायदे आज़म’ (महान नेता) के रूप में विख्यात हुए। 1940 ई. में उन्होंने धार्मिक आधार पर भारत के विभाजन तथा मुसलिम बहुसंख्यक प्रान्तों को मिलाकर पाकिस्तान बनाने की मांग की। बहुत कुछ उन्हीं वजह से 1947 ई. में भारत का विभाजन और पाकिस्तान की स्थापना हुई। पाकिस्तान के पहले गवर्नर-जनरल बनकर उन्होंने पाकिस्तान को एक इस्लामी राष्ट्र बनाया। पंजाब के दंगे तथा सामूहिक रूप से जनता का एक राज्य से दूसरे राज्य को निगर्मन उन्हीं के जीवनकाल में हुआ। भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर का मुद्दा भी उन्होंने ही खड़ा किया। 11 सितम्बर, 1948 ई. को कराची में उनकी मृत्यु हो गई।

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