ओशो की जीवनी | Osho Biography in Hindi

 

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ओशो की जीवनी | Osho Biography in Hindi

श्री रजनीश (जन्म चंद्र मोहन जैन, 11 दिसम्बर 1931 – 19 जनवरी 1990) साधारणतः ओशो / Osho, आचार्य रजनीश और रजनीश के नाम से भी जाने जाते है, वे एक भारतीय तांत्रिक और रजनीश अभियान के नेता थे। अपने जीवनकाल में Osho एक विवादास्पद रहस्यवादी, गुरु और आध्यात्मिक शिक्षक माना गया था। 1960 में उन्होंने सार्वजनिक वक्ता के रूप में पुरे भारत का भ्रमण किया था और महात्मा गाँधी और हिन्दू धर्म ओथडोक्सी के वे मुखर आलोचक भी थे। मानवी कामुकता पर भी वे सार्वजनिक जगहों पर अपने विचार व्यक्त करते थे, इसीलिए अक्सर उन्हें “सेक्स गुरु” भी कहा जाता था, भारत में उनकी यह छवि काफी प्रसिद्ध थी, लेकिन बाद में फिर इंटरनेशनल प्रेस में लोगो ने उनके इस स्वभाव को अपनाया और उनका सम्मान किया।

जन्म चन्द्र मोहन जैन
११ दिसम्बर १९३१
कुचवाडा ग्राम, रायसेन ज़िला भोपाल, मध्य प्रदेश, भारत
मृत्यु जनवरी 19, १९९० (उम्र 58)
पुणे,भारत
राष्ट्रीयता भारतीय
अन्य नाम भगवान, ओशो
व्यवसाय गुरु, रहस्यदर्शी
प्रसिद्धि कारण नव्य-सन्यास
प्रसिद्ध कार्य 600 से अधिक प्रवचन पुस्तकों के रूप में कई भाषाओं में अनुवादित और प्रकाशित।
पदवी आचार्य भगवान ओशो
आंदोलन जीवन-जाग्रति आन्दोलन

ओशो की जीवनी / Osho Biography in Hindi

1970 में Osho  ने ज्यादातर समय बॉम्बे में अपने शुरुवाती अनुयायीओ के साथ व्यतीत किया था, जो “नव-सन्यासी” के नाम से जाते थे। इस समय में वे ज्यादातर आध्यात्मिक ज्ञान ही देते थे और दुनियाभर के लोग उन्हें रहस्यवादी, दर्शनशास्त्री, धार्मिक गुरु और ऐसे बहुत से नामो से बुलाते थे। 1974 में Osho पुणे में स्थापित हुए, जहाँ उन्होंने अपने फाउंडेशन और आश्रम की स्थापना की ताकि वे वहाँ भारतीय और विदेशी दोनों अनुयायीओ को “परिवर्तनकारी उपकरण” प्रदान कर सके। 1970 के अंत में मोरारी देसाई की जनता पार्टी और उनके अभियान के बीच हुआ विवाद आश्रम के विकास में रूकावट बना।

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ओशो की जीवनी | Osho Biography in Hindi

1981 में वे अमेरिका में अपने कार्यो और गतिविधियों पर ज्यादा ध्यान देने लगे और Osho फिर से ऑरेगोन के वास्को काउंटी के रजनीशपुरम में अपनी गतिविधियों को करने लगे। लेकिन फिर वहाँ भी राज्य सरकार और स्थानिक लोगो के मदभेद के चलते उनके आश्रम के निर्माण कार्य को घटाया गया था। 19’85 में कुछ गंभीर केसों पर छानबीन की गयी जिनमे 1984 का रजनीश बायोटेरर अटैक और यूनाइटेड स्टेट प्रतिनिधि चार्ल्स एच. टर्नर की हत्या का केस भी शामिल है। इसके बाद अल्फोर्ड दलील सौदे के अनुसार वे यूनाइटेड स्टेट से स्थानांतरित हो चुके थे।

इसके बाद उनके 21 वी शताब्दी में निर्वासन करने के बाद वे वापिस भारत में आए और वापिस उन्होंने पुणे के आश्रम में अपने कार्य करना शुरू किये, जहाँ 1990 में उनकी मृत्यु भी हो गयी थी। वर्तमान में उनका आश्रम ओशो अंतर्राष्ट्रीय ध्यान केंद्र नाम से प्रसिद्ध है। उनकी समधर्मी शिक्षा ने लोगो को ध्यान, जागरूकता, प्यार, उत्सव, हिम्मत, रचनात्मकता और हास्य गुणवत्ता का महत्त्व बताया। रजनीश के विचारो का ज्यादातर प्रभाव पश्चिमी नव-युवको पर गिरा और उनकी मृत्यु के बाद देश-विदेश में उनका महत्त्व और भी बढ़ गया था एवं वे ज्यादा प्रसिद्ध हो गये थे।

11 दिसम्बर 1931 : Osho का जन्म मध्य भारत के मध्यप्रदेश राज्य के एक छोटे से गाँव कुचवाडा में हुआ था। जैन कपडा व्यापारी के ग्यारह बच्चो में वे सबसे बड़े थे। उनकी बचपन की कहानियो के अनुसार वे एक स्वतंत्र और बलवई बालक थे, जो हमेशा सामाजिक, धार्मिक और दर्शनशास्त्र के मुद्दों पर प्रश्न पूछते रहते थे। युवावस्था में उन्होंने ध्यान लगाना शुरू किया था।

21 मार्च 1953 : 21 साल की उम्र में जबलपुर के डी.एन. जैन कॉलेज में दर्शनशास्त्र की पढाई करते हुए Osho प्रबुद्ध बने।

1953-1956 : पढाई

1956 : सागर यूनिवर्सिटी से दर्शनशास्त्र में फर्स्ट क्लास से एम.ए. की डिग्री हासिल की।

ग्रेजुएशन की पढाई पूरी करते समय वे ऑल इंडिया डिबेट चैंपियन और गोल्ड मैडल विजेता भी रह चुके है।

1957-1966 – यूनिवर्सिटी प्रोफेसर और सार्वजानिक वक्ता।

1957-1966 – रायपुर के संस्कृत कॉलेज में उनकी नियुक्ती प्रोफेसर के पद पर की गयी थी।

1958 : जबलपुर यूनिवर्सिटी में उनकी नियुक्ती दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर के पद पर की गयी, जहाँ उन्होंने 1966 तक पढाया था। एक शक्तिशाली डिबेटर के रूप में, उन्होंने पुरे भारत की यात्रा कर रखी थी, बड़े पैमाने पर सार्वजनिक जगहों पर वे बोलते थे।

1966 : 9 साल तक पढ़ाने के बाद, उन्होंने खुद को पूरी तरह से मानवी चेतना में समर्पित कर देने के लिए यूनिवर्सिटी में पढ़ाना छोड़ दिया। इसके बाद उन्होंने भारत में खुले मैदानों पर तक़रीबन 20000 से 50000 लोगो को भाषण देना शुरू किया। इतना ही नहीं बाकि साल में चार बार वे भारत के मुख्य शहरो में 10 दिन के ध्यान और व्यायाम शिबिर का भी आयोजन करते थे।

1970 में 14 अप्रैल को उन्होंने खुद की क्रांतिकारी ध्यान यंत्रनाओ को उजागर किया था, जिससे उनके जीवन में एक नए अध्याय की शुरुवात हुई। क्योकि उनके द्वारा बताई गयी ध्यान यंत्रनाओ का उपयोग मेडिकल डॉक्टर, शिक्षक और दुनियाभर में बहुत से लोग ध्यान लगाने के लिए करते थे।

1969-1974 – मुंबई में बिताये हुए साल।

1960 के अंतिम दिनों में : उनके हिंदी भाषण अंग्रेजी में भी अनुवाद करके लोगो को उपलब्ध कराये गये थे।

1970 : जुलाई 1970 में वे मुंबई चले गये, जहाँ वे 19’74 तक रहे थे।

1970 : Osho को इस समय भगवान श्री रजनीश का नाम दिया गया था – इस समय उनके अनुयायीओ को नव-संस्यासी का नाम दिया गया था। और अपनी ध्यान यंत्रनाओ और अपने शब्दों से वे लोगो को मंत्रमुग्ध कर देते थे, इस समय में उन्होंने वैश्विक स्तर पर खुद को प्रसिद्ध बनाया। वे लोगो को सन्यास शब्द का महत्त्व समझाते थे। उनके अनुसार मानव को नश्वर चीजो की मोह-माया नही होनी चाहिए और ना ही हमें भूतकाल के बारे में ज्यादा सोचना चाहिए। इसके साथ-साथ वे राजस्थान के माउंट अबू में अपने ध्यान शिबिर भी लिया करते थे, और उन्होंने सार्वजनिक जगहों पर बोलने के आमंत्रण को अपनाने से इंकार कर दिया। इस समय से वे अपना पूरा समय नव सन्यासियों धार्मिक और आध्यात्मिक ध्यान देने में ही व्यतीत करते थे।
इस समय में, उनके आश्रम में विदेशी लोग भी आया करते थे और उन्हें नव-सन्यासियो का नाम दिया गया था। यूरोप और अमेरिका में लोग उन्हें मनोचिकित्सक भी कहते थे, क्योकि विदेशी लोगो के अनुसार वे इंसान का आंतरिक विकास करते थे।

1974-1981 – पुणे आश्रम
इन सात सालो के समय में वे रोज़ सुबह तक़रीबन 90 मिनट का प्रवचन देते थे, उनके यह प्रवचन हिंदी और इंग्लिश दोनों भाषाओ में होते थे। उनके प्रवचन में सभी आध्यात्मिक और धार्मिक तथ्यों का उल्लेख होता था, जिनमे योगा, जेन, ताओवाद, तंत्र और सूफी विद्या का भी समावेश था। इसके साथ-साथ वे गौतम बुद्धा, जीसस, लाओ तजु और दुसरे रहस्यवादी लोगो पर भी प्रवचन देते थे। इन प्रवचन को बड़े पैमाने पर लोग सुनते थे और तक़रीबन इन्हें 50 से भी ज्यादा भाषाओ में स्थानांतरित किया जा चूका है।

इस वर्षो में शाम के समय वे लोगो की बीजी जिंदगी से जुड़े प्रश्नों का जवाब देते थे, जो ज्यादातर प्यार, जलन, ध्यान और क्रोध इत्यादि विषयो पर आधारित होते थे। इन दर्शनों को 64 डायरी में संकलित किया गया है जिनमे से 40 को प्रकाशित भी किया जा चूका है।

ध्यान लगाने के लिए ओशो ने बहुत सी थेरेपी भी बताई थी, जो इस समय में पश्चिमी देशो और भारत में काफी प्रसिद्ध और प्रभावशाली साबित हुई थी। पश्चिमी मनोविज्ञान के अनुसार उनकी थेरेपी के बहुत से फायदे थे। दुनिया के बहुत से थेरापिस्ट उनकी ध्यान साधनाओ से काफी प्रभावित हो चुके थे, 1980 में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने उनके आश्रम को “दुनिया का सर्वश्रेष्ट विकसित और सबसे अच्छा थेरेपी सेंटर” भी बताया था।

1981 : उन्होंने अपक्षायी वापसी की परिस्थिति को विकसित किया। मार्च 1981 में तक़रीबन 15 सालो तक रोज प्रवचन देने के बाद ओशो ने तीन साल का मौन व्रत रखा। क्योकि शायद उन्हें लगा की उन्हें किसी आपातकालीन सर्जरी की जरुरत है और अपने निजी डॉक्टरो की सलाह पर, इसी साल उन्होंने यूनाइटेड स्टेट की यात्रा भी की। उसी साल अमेरिका में उनके भक्तो ने 64,000 एकर खेती ओरेगन में खरीदी और वहाँ उन्होंने ओशो को आमंत्रित किया था। इसके बाद अचानक वे यूनाइटेड स्टेट में रहने के लिए राजी हुए और उनकी तरफ से यूनाइटेड स्टेट का रहवासी होने का एप्लीकेशन भी उन्होंने वहाँ दे रखा था।

1981-1985 – रजनीशपुरम
एक मॉडल एग्रीकल्चर कम्यून को सेंट्रल ऑर्गेनियन हाई डेजर्ट ने बर्बाद किया। स्थापित किया गया रजनीशपुरम शहर लगभग 5,000 रहवासियों को सर्विस देते थे। इसके बाद हर साल यहाँ समर फेस्टिवल का भी आयोजन किया गया था। जल्द ही रजनीशपुरम एक प्रसिद्ध धार्मिक समुदाय बन चूका था।

अक्टूबर 1984 : ओशो के मौन को साढ़े तीन साल पुरे हुए।

जुलाई 1985 : उन्होंने अपने सार्वजानिक प्रवचनों को पुनः शुरू किया और हर सुबह 2 एकर के ध्यान केंद्र में हजारो लोग उनका प्रवचन सुनने आते थे।
सितम्बर-अक्टूबर 1985 : ऑरेगोन कम्यून को बर्बाद किया गया।

14 सितम्बर : ओशो की पर्सनल सेक्रेटरी माँ आनंद शीला और कम्यून के बहुत से सदस्यों ने मैनेजमेंट अचानक अच्चोद दिया और उनके आश्रम को एक अवैध काम करने वाला आश्रम बताया। इन कामो में विषाक्तीकरण, आगजनी, तार में जोड़ लगाकर सुनना और हत्या करने की कोशिश करने जैसे काम शामिल थे। इसके बाद ओशो ने शीला की जुर्म पर ओशो ने लॉ इंफोर्समेंट ऑफिसियल को भी आमंत्रित किया था। क्योकि, छानबीन ही पूरी कम्यून के विनाश का एक अच्छा अवसर था।

23 अक्टूबर : पोर्टलैंड की ए.यु.एस. फ़ेडरल ग्रैंड जूरी ने ओशो और 7 दुसरे लोगो पर आप्रवासी छल के आरोप लगाए गये।

28 अक्टूबर – बिना किसी वारंट के, फ़ेडरल और स्थानिक अधिकारियो ने ओशो और उनके दुसरे सदस्यों को चार्लोट में गिरफ्तार कर लिया। दूसरो को बाद में छोड़ दिया गया था और उन्हें भी बिना किसी बेल के 12 दिनों तक छोड़ दिया गया था। इसके बाद ऑरेगोन वापिस जाने के लिए चार दिन लगे थे।

नवम्बर : Osho  के आप्रवासी छल वाले केस में ओशो को सार्वजानिक प्रसिद्धि मिलती गयी और साथ में भावुक लोगो का साथ भी मिलता गया। लाखो मासूम और भोले भक्तो का साथ ओशो को इस केस में मिलता गया जिनपर कुल 35 आरोप लगे हुए थे। ओशो को कोर्ट ले जाते समय भी कोर्ट में उनके साथ पूरा जनसैलाब मौजूद था। और उनके भक्तो ने कोर्ट में भी मासूम बनने का नाटक किया और ओशो को भी भोला और मासूम बताया। इसके बाद ओशो पर 400,000 $ का जुर्माना लगाया गया और उन्हें अमेरिका से निर्वासित भी किया गया।

1985-1986 – वर्ल्ड टूर
जनवरी-फरवरी –उन्होंने नेपाल में काठमांडू की यात्रा की और अगले दो महीने पर रोज़ दो बार बोलते थे। फरवरी में नेपाली सरकार ने उनके दर्शनार्थियों और उनसे जुड़े हुए सदस्यों को वीजा देने से इंकार कर दिया था। इसके बाद उन्होंने नेपाल छोड़ दिया था और वे वर्ल्ड टूर पर चले गये थे।
फरवरी-मार्च – सबसे पहले वे ग्रीस गये, वहाँ 30 दिनों तक का उनका वीजा वैध था। लेकिन 18 दिनों के बाद ही 5 मार्च को ग्रीक पुलिस वहाँ चली आयी जहाँ वे रहते थे और पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर अपने देश से निकाल दिया। ग्रीक मीडिया के अनुसार सरकार और चर्च के दबाव के कारण उन्हें ऐसा करना पड़ा था।

इसके बाद दो हफ्तों तक वे रोज यूरोप और अमेरिका के 17 देशो में घुमने की आज्ञा देने का निवेदन करते रहे। लेकिन इनमे से सभी देशो ने या तो उन्हें आज्ञा देने से मना कर दिया या तो किसी ने उनके आने पर जबर्दाती वीजा जब्त कर देने की धमकी दी। कुछ देशो ने तो उनके प्लेन को भी लैंड करने की आज्ञा नही दी थी।

मार्च-जून – 19 मार्च को वे उरुग्वे की यात्रा पर गये। 14 मार्च को सरकार ने एक प्रेस कांफ्रेंस में उनकी यात्रा के बारे में घोषणा की थी और उरुग्वे में उन्हें सरकार ने रहने की भी इजाजत दे दी थी। उरुग्वे के राष्ट्रपति सन्गुइनेत्ति ने बाद में बताया भी की उन्हें प्रेस कांफ्रेंस से पहले वाशिंगटन डी.सी. से एक कॉल आया था। जिसमे उन्हें कहा गया था की यदि ओशो को उरुग्वे में रहने दिया गया तो उन्होंने यूनाइटेड स्टेट से जो 6 बिलियन डॉलर का कर्जा लिया है वह तुरंत लौटाना होंगा और यूनाइटेड स्टेट उन्हें कभी कर्ज नही देंगा। यह सुनते ही 18 जून को Osho ने उरुग्वे छोड़ दिया था।

जून-जुलाई – अगले महीने में वे जमैका और पुर्तगाल से वापिस आ गये। सभी 21 देशो ने उनके प्रवेश पर रोक लगा दी थी और देश में कदम रखते ही उन्हें वापिस लौट जाने को कहा जाता था। इसी वजह से 29 जुलाई 1986 को वे मुंबई, भारत वापिस आ गये।

1987-1989 – ओशो कम्यून इंटरनेशनल

जनवरी 1887 : वे भारत में पुणे के आश्रम में वापिस आए, जिसका नाम बाद में बदलकर रजनीशधाम रखा गया था।

जुलाई 1988 : Osho ने 14 साल में पहली बाद हर शाम में प्रवचन खत्म करने के बाद स्वतः ध्यान लगाना शुरू किया। इस तरह उन्होंने ध्यान की तकनीक में एक क्रांतिकारी बदलाव लाया था और ध्यान लगाने की नयी तकनीको के बारे में वे लोगो को बताते थे।

जनवरी-फरवरी 1989 : भगवान के नाम का उपयोग करना छोड़ दिया था, अब उन्होंने अपना नाम केवल रजनीश ही रखा। जबकि उनके भक्त लोग उन्हें Osho कहकर बुलाते थे, और रजनीश ने भी उनके इस नाम को स्वीकार किया था। Osho ने बताया की उनके नाम की उत्पत्ति विलियम जेम्स के शब्द “ओशनिक” से हुई थी जिसका अर्थ समंदर में मिल जाने से है।

मार्च-जून 1989 – विषाक्तीकरण के प्रभाव से ठीक होने के लिए Osho आराम कर रहे थे, इसका सबसे ज्यादा असे उनके स्वास्थ पर पड़ा था।

जुलाई 1989 : उनका स्वास्थ धीरे-धीरे ठीक हो रहा था और उनके दर्शन के लिए एक कार्यक्रम का भी आयोजन किया गया था, जिसमे मौन रखकर लोग उनका दर्शन लेते थे, इस कार्यक्रम को Osho फुल मून फेस्टिवल का नाम भी दिया गया था।

अगस्त 1989 : Osho रोज गौतम और बुद्ध के पेक्षागृह में दर्शन के लिए आटे थे। उन्होंने सफ़ेद कपड़ो के सन्यासियों का एक समूह भी बनाया था जिसे “ओशो के सफ़ेद कपडे पहने हुए भाई” का नाम दिया गया था। Osho के सभी सन्यासी और असन्यासी उनके शाम के दर्शन के लिए आटे थे।

सितम्बर 1989 : Osho ने अपना नाम रजनीश भी छोड़ दिया। अब वे सिर्फ Osho के नाम से जाने जाते थे और उनके आश्रम का भी नाम बदलकर ओशो कम्यून इंटरनेशनल का नाम रखा गया था।

1990 को Osho ने अपना शरीर छोड़ा था।

जनवरी 1990 : जनवरी के दुसरे सप्ताह में Osho का शरीर पूरी तरह से कमजोर हो गया था। 18 जनवरी को, वे शारीरक रूप से बहुत कमजोर हो चुके थे, बल्कि वे गौतम और बुद्ध पेक्षागृह में आने में भी असमर्थ थे। 19 जनवरी को उनकी नाडी का धडकना भी कम हो गया था। और जब उनके डॉक्टर ने उनका गंभीर इलाज करने के लिए उनसे इजाजत मांगी तो उन्होंने मना कर दिया, और उन्हें जाने देने के लिए कहा। और कहाँ की प्रकृति ने मेरा समय निर्धारित कर रखा है। शाम 5 PM बजे उन्होंने अपना शरीर छोड़ा था। 7 PM को उनके शरीर को गौतम और बुद्धा पेक्षागृह में लाया गया था और फिर अंतिम क्रिया करने के लिए घाट पर ले जाया गया था दो दिन बाद, उनकी अस्थियो को ओशो कम्यून इन्तेर्नतिओन में ले जाया गया और उनकी समाधी में उनकी अस्थियो को शिलालेख के साथ रखा गया था।

ओशो के अनमोल विचार

Quotes 1: अगर आप सत्य देखना चाहते हैं तो न सहमती में राय रखिये और न असहमति में.

Osho ओशो

 

 

Quotes 2: केवल वह लोग जो कुछ भी नहीं बनने के लिए तैयार हैं वह प्रेम कर सकते हैं.

Osho ओशो

 

Quotes 3: जेन लोग बुद्ध से इतना प्रेम करते हैं कि वो उनका मज़ाक भी उड़ा सकते हैं. यह अथाह प्रेम कि वजह से है, उनमे डर नहीं है.

Osho ओशो

 

Quotes 4: किसी से किसी भी तरह की प्रतिस्पर्धा की आवश्यकता नहीं है. आप स्वयं में जैसे भी हैं एकदम सही हैं. खुद को स्वीकार करिए.

Osho ओशो

 

Quotes 5: सवाल यह नहीं है कि कितना सीखा जा सकता है बल्कि इसके उलट, सवाल यह है कि कितना भुलाया जा सकता है.

Osho ओशो

 

Quotes 6: दोस्ती शुद्ध प्रेम है. यह प्रेम का सर्वोच्च रूप है जहाँ कुछ भी नहीं माँगा जाता, कोई भी शर्त नहीं होती, जहां बस देने में आनंद आता है.

Osho ओशो

 

 

 

Quotes 7: यहाँ कोई भी आपका सपना पूरा करने के लिए नहीं है. सभी व्यक्ति अपनी तकदीर और अपनी हक़ीकत बनाने में लगे है.

Osho ओशो

 

Quotes 8: कुछ भी चुनाव मत करिए. जीवन को ऐसे पनाये जैसे वो अपनी समग्रता में है.

Osho ओशो

 

Quotes 9: जब प्यार और नफरत दोनों ही न हो तो हर चीज साफ़ और स्पष्ट हो जाती है.

Osho ओशो

 

Quotes 10: जीवन ठहराव और गति के बीच का संतुलन है.

Osho ओशो

 

Quotes 11: मूर्ख लोग दूसरों पर हँसते हैं वही बुद्धिमान खुद पर.

Osho ओशो

 

Quotes 12: उस तरह से मत चलिए जिस तरह डर आपको चलाये. उस तरह से चलिए जिस तरह प्रेम आपको चलाये. उस तरह चलिए जिस तरह ख़ुशी आपको चलाये.

Osho ओशो

 

Quotes 13: कोई प्रबुद्ध कैसे बन सकता है ? वह बन सकता है क्योंकि वो प्रबुद्ध होता है – उसे बस इस बात को पहचानना होता है.

Osho ओशो

 

 

 

Quotes 14: जिस दिन आप ने यह सोच लिया कि आपने ज्ञान पा लिया है, आपकी मृत्यु हो जाती है क्योंकि अब ना कोई आश्चर्य होगा, ना कोई आनंद और ना कोई अचरज. अब आप एक मृत वाला जीवन जीयेंगे.

Osho ओशो

 

Quotes 15: आत्मज्ञान एक समझ है कि यही सबकुछ है, यही बिलकुल सही है, बस  यही है. आत्मज्ञान यह जानना है कि ना कुछ पाना है और ना कहीं जाना है.

Osho ओशो

 

Quotes 16: जेन एकमात्र वह धर्म है जो एकाएक आत्मज्ञान सीखाता है. इसका कहना है कि आत्मज्ञान में समय नहीं लगता, ये बस कुछ ही क्षणों में हो सकता है.

Osho ओशो

 

Quotes 17: अर्थ मनुष्य द्वारा बनाये गए हैं क्योंकि आप लगातार अर्थ जानने में लगे रहते हैं इसलिए आप अर्थहीन महसूस करने लगते हैं.

Osho ओशो

 

Quotes 18: जब मैं आपसे कहता हूँ कि आप देवी – देवता हैं तो मेरा मतलब होता है कि आप में असीम संभावनाएं है, आपकी क्षमताएं अनंत हैं.

 

Osho ओशो

 

Quotes 19: आप वह बन जाते हैं जो आप सोचते हैं कि आप वह हैं.

Osho ओशो

 

Quotes 20: प्रसन्नता सदभाव की छाया है, वो सदभाव का पीछा करती है. प्रसन्न रहने का कोई और तरीका नहीं है.

Osho ओशो

 

Quotes 21: जीवन कोई दुखद घटना नहीं है, यह एक हास्य है. जीवित रहने का मतलब है हास्य का बोध होना.

Osho ओशो

 

Quotes 22: अधिक से अधिक भोले, कम ज्ञानी और बच्चों की तरह बनिए. जीवन को मजे के रूप में लीजिये क्योंकि यही वास्तविकता में जीवन है.

Osho ओशो

 

Quotes 23: अगर आप एक दर्पण बन सकते हैं तो आप एक ध्यानी भी बन सकते हैं. ध्यान दर्पण में देखने की कला है.

Osho ओशो

 

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