एस. एच. रज़ा की जीवनी – S. H. Raza Biography in Hindi

Sayed Haider “S. H.” Raza was an Indian painter चित्रकार who lived and worked in France since 1950, while maintaining strong ties with India.

एस. एच. रज़ा की जीवनी – S. H. Raza Biography in Hindi

Born: 22 February 1922, Mandla district बाबरिया, मंडला, मध्य प्रदेश
Died: 23 July 2016, New Delhi
Nationality: Indian
Education: École nationale supérieure des Beaux-Arts
Awards: Padma Bhushan, Padma Vibhushan

एस. एच. रज़ा की जीवनी - S. H. Raza Biography in Hindi
एस. एच. रज़ा की जीवनी – S. H. Raza Biography in Hindi

कार्यक्षेत्र: चित्रकारी

पुरस्कार/सम्मान: पद्म विभूषण (2013), पद्म भूषण (2007), पद्म श्री (1981), ललित कला अकादमी फेल्लो (1981)

सैय्यद हैदर रजा, जिन्हें एस. एच. रज़ा S. H. Raza  के नाम से भी जाना जाता है, एक जाने-माने भारतीय चित्रकार artist  हैं जो सन 1950 के आस-पास से फ्रांस में ही रहते हैं और वहीँ कार्य भी करते हैं। उनके चित्र मुख्यतः  तेल या एक्रेलिक में बने परिदृश्य हैं और उनमे रंगों का अत्यधिक प्रयोग किया गया है। इसके साथ-साथ उनके चित्र भारतीय ब्रह्माण्ड विज्ञान और दर्शन के चिह्नों से भी परिपूर्ण हैं। india govt. ने इस प्रतिष्ठित चित्रकार को पद्म विभूषण (2013), पद्म भूषण (2007), पद्म श्री (1981) जैसे सम्मानों से नवाजा है। 14 जुलाई 2015 को france की सरकार ने उन्हें देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘लीजन ऑफ़ ऑनर’ दिया।

10 जून 2010 को कलादीर्घा क्रिस्टी की नीलामी में S. H. Raza का ‘सौराष्ट्र’ नामक एक चित्र लगभग 16.42 करोड़ रुपयों में बिका जिसके बाद वे उस समय तक के भारत के सबसे महंगे आधुनिक कलाकार बन गए।

प्रारंभिक जीवन

S. H. Raza सैयद हैदर रज़ा का जन्म 22 फरवरी 1922 को मध्य प्रदेश के मंडला जिले के बाबरिया में हुआ था। उनके पिता का नाम सैयद मोहम्मद रज़ी और माता का नाम ताहिरा बेगम था। Raza मोहम्मद रज़ी जिले के उप वन अधिकारी थे। इसी स्थान पर S. H. Raza ने अपने जीवन के प्रारंभिक वर्ष गुज़ारे व 12 वर्ष की आयु में painting सीखी। 13 वर्ष की आयु में उन्हें दामोह भेज दिया गया जहाँ उन्होंने राजकीय उच्च विद्यालय से अपनी स्कूली शिक्षा प्राप्त की।

हाई स्कूल की पढ़ाई के बाद उन्होनें नागपुर कला विद्यालय में दाखिला लिया जहाँ उन्होंने 1939-43 के मध्य अध्ययन किया और उसके बाद mumbai के प्रसिद्ध सर जे.जे. स्कूल ऑफ़ आर्ट में दाखिला लिया जहाँ उन्होंने सन 1943-47 तक शिक्षा ग्रहण की। इसके उपरान्त उन्हें सन 1950 में france govt. से छात्रवृति प्राप्त हो गयी जिसके बाद अक्टूबर 1950 में वे पेरिस के विश्व प्रसिद्द ‘इकोल नेशनल सुपेरियर डे ब्यू आर्ट्स’ से शिक्षा ग्रहण करने के लिए फ़्रांस चले गए। उन्होंने यहाँ 1950-1953 के मध्य पढ़ाई की और उसके बाद पूरे europe की यात्रा की। शिक्षा समाप्ति के बाद वे पेरिस में रहकर काम करने लगे और अपने चित्रों का प्रदर्शन जारी रखा। सन 1956 में उन्हें पेरिस में ‘प्रिक्स डे ला क्रिटिक’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जिसे प्राप्त करने वाले वह पहले गैर-फ़्रांसिसी कलाकार थे।

करियर

सैयद हैदर रज़ा S. H. Raza की पहली एकल प्रदर्शनी सन 1946 में बॉम्बे आर्ट सोसाइटी में प्रदर्शित हुई। सोसाइटी ने उन्हें रजत पदक से सम्मानित किया।

1940 के शुरुआती दौर में परिदृश्यों तथा शहर के चित्रणों से गुजरते हुए उनकी चित्रकारी का झुकाव चित्रकला की अधिक अर्थपूर्ण भाषा, मस्तिष्क के चित्रण की ओर हो गया।

वर्ष 1947 में उन्होनें के.एच. आरा तथा ऍफ़.एन. सूज़ा के साथ ‘बॉम्बे प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप’ की स्थापना की। इस ग्रुप का मुख्य मकसद था भारतीय कला को यूरोपीय यथार्थवाद के प्रभावों से मुक्ति और इसमें भारतीय अंतर दृष्टि (अंतर ज्ञान) का समावेश। बॉम्बे प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप’ ने अपनी पहली प्रदर्शनी सन 1948 में आयोजित की।

फ्रांस में S. H. Raza ने वृहद् परिदृश्यों के चित्रण तथा अंततः इसमें भारतीय हस्तलिपियों के तांत्रिक तत्वों को सम्मिलित कर पश्चिमी आधुनिकता की धारा के साथ प्रयोग जारी रखा। जिस समय उनके समकालीन चित्रकार अपनी कला के लिए अधिक औपचारिक विषय चुन रहे थे,  उस समय S. H. Raza ने 1940 और 50 के दशकों के परिदृश्यों के चित्रण पर ध्यान केंद्रित करने का फैसला किया।

सन 1962 में उन्होंने अमेरिका के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय (बर्कले) में अंशकालिक व्याख्याता का पद स्वीकार किया। प्रारंभ में फ्रांस के ग्रामीण इलाकों और उसके ग्राम्य जीवन ने S. H. Raza को बहुत आकृष्ट किया।

1970 के दशक में उनके जीवन में ऐसा समय आया जब S. H. Raza अपने काम से नाखुश और बेचैन होने लगे। S. H. Raza अपनी कला में एक नई दिशा और गहरी प्रामाणिकता पाना चाहते थे। इसके बाद उन्होंने भारत का दौरा किया जहाँ उन्हें अपनी जड़ों का एहसास हुआ तथा भारतीय संस्कृति को निकटता से जानने का अवसर मिला, जो उनकी कला में ‘बिंदु’ के रूप में उभरकर सामने आया। ‘बिंदु’ का उदय 1980 में हुआ और यह उनके कला को और अधिक गहराई में ले गया।

2000 के आस-पास उनकी कला ने एक नई करवट ली जब उन्होनें भारतीय अध्यात्म पर अपने विचारों को व्यक्त करना शुरू किया। इसका परिणाम था कुंडलिनी, नाग और महाभारत के विषयों पर आधारित चित्र।

S. H. Raza ने भारतीय युवाओं को कला में प्रोत्साहन देने के लिए भारत में ‘रज़ा फाउंडेशन’ की  स्थापना भी की जो युवा कलाकारों को वार्षिक रज़ा फाउंडेशन पुरस्कार प्रदान करता है।

व्यक्तिगत जीवन

S. H. Raza ने सन 1959 में पेरिस के ‘इकोल डे ब्यू आर्ट्स’ की अपनी सहपाठी जेनाइन मोंगिल्लेट से विवाह किया। जेनाइन बाद में एक प्रसिद्ध कलाकार और मूर्तिकार बन गईं। विवाह उपरान्त जेनाइन की मां ने S. H. Raza से फ्रांस में ही रहने का अनुरोध किया जिसके बाद वे वहीँ बस गए। जेनाइन की मृत्यु 5 अप्रैल 2002 को पेरिस में हुई।

S. H. Raza पुरस्कार और सम्मान

1946: रजत पदक, बॉम्बे आर्ट सोसाइटी, मुंबई

1948: स्वर्ण पदक, बॉम्बे आर्ट सोसायटी,

मुंबई1956: प्रिक्स डे ला क्रिटिक,

पेरिस1981: पद्म श्री, भारत सरकार

1981: ललित कला अकादमी की मानद सदस्यता, नई दिल्ली

1981: कालिदास सम्मान, मध्य प्रदेश सरकार

2007: पद्म भूषण, भारत सरकार

 

 

 

 

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