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स्टीफ़न हॉकिंग्स का आशावादी जीवन | Real Life Inspirational Story

प्रसिद्ध वैज्ञानिक Stephen Hawking की जिंदगी कुछ ऐसी है जो सबको हैरान कर सकती है। आज की परिस्थिति में वे न तो चल सकते हैं, न बोल सकते हैं और न ही वे अपने हाथोँ से कोई काम कर सकते हैं। उनका शरीर किसी भी तरह का कोई भी काम करने में पूरी तरह से अक्षम व असमर्थ है। वे केवल कम्प्यूटर के माध्यम से संकेत देते रहते हैं कि उन्हें क्या चाहिए, वे क्या कहना चाहते हैं और क्या करना चाहते हैं? इन सबके बावजूद वे एक महान वैज्ञानिक हैं और लगातार अपना काम कर रहे हैं।

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The Theory of Everything, a beautifully made drama starring Eddie Redmayne
ऐसा नहीं था कि पैदाईशी उन्हें कोई बीमारी थी। पहले तो वे पूर्णतया स्वस्थ थे, लेकिन 21 वर्ष की उम्र में अचानक ही इस बीमारी का उनके जीवन में आगमन हो गया, जब वे ऑक्सफर्ड विश्वविद्यालय में स्नातक पाठ्यक्रम के तीसरे वर्ष के विधार्थी थे। उस समय बीमारी के कारण उनकी शारीरिक गतिविधियाँ प्रभावित होने लगी और वे सीढ़ियों पर चढ़ते हुए लडखडाने लगे। एक बार जब स्केटिंग करते हुए वे बर्फ़ पर गिर गए तब उन्हें होस्पिटल ले जाया गया और फिर जैसे-जैसे डॉक्टरों की जाँच आगे बढ़ी, बीमारी की गंभीरता सामने आने लगी। उन्हें पता चला कि वे एक बीमारी से ग्रस्त हो चुके थे, जिसका नाम था – एमायोट्रोफिक लैटरल स्कलीरोसिस।
यह एक ऐसी बीमारी है, जिसमें व्यक्ति का मस्तिष्क अपने शरीर पर से नियंत्रण खो देता है। उस समय डॉक्टरों का कहना था कि स्टीफ़न अब अधिकतम दो साल तक ही जिंदा रह पाएंगे, लेकिन इससे बढ़कर आश्चर्य की बात और क्या होगी कि वे इस बीमारी के बावजूद अब भी जीवित हैं। उन्हें इस बीमारी से लड़ते हुए 50 वर्ष हो गए, लेकिन यह बीमारी अभी भी उन्हें हरा नहीं पाई। इसका कारण बस उनकी सकारात्मक सोच व उनका हौसला है, जिसने उन्हें जिंदगी की सबसे विवश कर देने वाली परिस्थितियों में भी एक सफल तथा प्रसिद्ध वैज्ञानिक के रूप में स्थापित कर दिया है।
स्टीफ़न ने एक साक्षात्कार में बताया कि जब इस बीमारी के बारे में उन्हें पहली बार जानकारी मिली तो वे भी सामान्य लोगों की तरह घबरा गए, सोचने लगे कि कुछ दिनों के बाद उनकी स्थिति अत्यंत दयनीय हो जाएगी और फिर इस अपाहिज शरीर के लिए इतनी पढ़ाई व पी.एच.डी. की डिग्री प्राप्त करने का क्या मतलब होगा? उन्हें लगा कि उनके देखे गए सभी सपनों पर इस बीमारी के कारण विराम लग जाएगा। लेकिन उस बीमारी की स्थिति में भी एक सकारात्मक बात यह थी कि उनका मस्तिष्क पूरी तरह स्वस्थ था, वे अच्छी तरह सोच सकते थे, मानसिक रूप से कार्य कर सकते थे और फिर उन्होंने वही किया, जो एक स्वस्थ मस्तिष्क वाले व्यक्ति को करना चाहिए, उन्होंने सकारात्मक सोच व हौसलापूर्ण नजरिये को अपनाया।
आज उनका यह कहना है – “सच कहूं तो कई बार मैं अपनी बीमारी के प्रति आभार व्यक्त करता हूँ, जिसके कारण मैं अपना पूरा ध्यान शोधकार्य में लगा सका और दूसरे कार्यो से बच गया। मैं थ्योरिटिकल फ़िज़िक्स में काम कर सका और इस काम में मेरी यह बीमारी कहीं बाधा नहीं बनी।” उनका यह भी कहना है कि औरों की नजर में मेरा जीवन सामान्य नहीं है, पर मैं ऐसा नहीं मानता। मैंने जो चाहा, वह किया है। मैं क्षमता, जोश, हिम्मत, उत्साह और धैर्य में किसी से कम नहीं हूँ और न ही अपने जीवन से निराश। पिछले 50 सालों से मैं अपनी जल्दी मृत्यु हो जाने की आशंकाओं में जी रहा हूँ। मैं मृत्यु से डरता नहीं हूँ, पर मुझे मरने की जल्दी भी नहीं है। मेरे पास अब भी बहुत कुछ करने के लिए है।
Stephen Hawking के जीवन का सबसे बड़ा मंत्र है “आशावान बनें और खुद को व्यस्त रखें”
इसी मंत्र के कारण वे आज भी जीवित हैं और उनका कहना है – “मैंने वह किया, जो मैं कर सकता था और उतना किया, जितना मैं चाहता था। मुझसे भी अधिक साहसी और सक्षम लोग बुरी दशा में जी रहे हैं। उनसे किसी की सहानुभूति नहीं है और वे शिकायत भी नहीं करते। दूसरे लोगों को मैं यही कहना चाहूँगा कि विकलांग होना आपकी गलती नहीं है। इसलिए किसी को दोष न दें और न ही सहानुभूति की अपेक्षा रखें। जीवन का यदि आपको विस्तार समझना है तो आपको सकारात्मक और व्यावहारिक सोच रखनी ही होगी। जरूरत यह है कि अपने जीवन की मौजूद स्थितियों में से सबसे बेहतर स्थिति का आप चुनाव करें। वहाँ मन को एकाग्र करें, जहाँ आप बेहतर कर सकते हैं।
इस तरह Stephen Hawking ने अपने जीवन के उदाहरण से यह बात प्रमाणित कर दी कि जीवन की विपदाओं में, बुरी-से-बुरी परिस्थितियों में भी धैर्य, साहस, सकारात्मक, आशावादी सोच व कार्य करने के जज़्बे को अपनाना चाहिए और नकारात्मक नज़रिये का त्याग करना चाहिए, आशावादी सोच ही सफल जीवन की आधारशिला है।

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